Friday, May 29, 2020

379. संभलके / Sambhalke

ये जिस्म अपना
बातूनी है बहुत

खामोश रहके भी
कहानियाँ सुनाता है
अफ़वाएँ फैलाता है

ऐसा है के
ये कुछ भी कहे
या कुछ न कहे
औरों को सुनाई देता है
कुछ न कुछ
और कुछ न कुछ
समझ आ ही जाता है

उस बच्ची के चेहरे पे मुस्कान
इस लड़के के चेहरे पे मेक-अप
उस औरत के सर को ढकता हिजाब
इस आदमी के माथे पे तिलक
उस बुज़ुर्ग का खुद से बातें करना
उस लड़की के पैर और उस पैर पे उगते बाल?

ये सभी तो
बेख़बर
बेखयाल
चले जा रहे हैं
सड़कों पर

पर लोग हैं कि
हर चीज़ में
कहानियाँ ढूँढते सुनते जाते हैं

तभी कहते हैं
सोच समझके निकला करो
घर से

क्या पता
क्या पढ़ ले बेकाम दुनिया
तुम्हारे लहजे में

Saturday, May 16, 2020

378. गुल्लक / Gullak

बचपन में
हम गुल्लक में अठन्नी-चवन्नी
जमा किया करते थे
के खर्च करेंगे वो पैसे
जब कोई दिलचस्प सा तजुर्बा मिले हमें

साथ में गोलगप्पे खाएँ
या खरीदें कोई टिंकल-चंपक
जो साथ बैठ-के पढें

काश हम वक़्त को जमा कर पाते ऐसे

आजकल
तुम्हारे बिना दिन-रात गुज़ारता तो हूँ पर
बेफ़िज़ूल लगते हैं सभी

जैसे इन लम्हों का
न कोई वजूद है न वजह

जैसे तुम्हारे बिना वक़्त है
पर ज़िंदगी नहीं

अगर वक़्त को जमा कर पाता तो
हर दिन के हर पहर का हर लम्हा
मैं डालता इक गुल्लक में

और जब दुनिया के दरवाज़े खुले

गुल्लक फोड़के वो सारे जमा लम्हे
लेकर आता तुम्हारे यहाँ
के हम साथ में खर्च करें
ये उम्र

और अपने लिए
थोड़ी यादें
थोड़ी ज़िंदगी
खरीद लें!